मुरली की धुन पर गोपी ग्वाल गायें सब,
नाचते थे वृन्दावन बीच बृज धाम में।
वह मृदु स्वर झंकार करे प्रेम संचार,
भागे भागे आते ऐसी मोहनी थी श्याम में।
हो रहा विलुप्त वह प्रेम सदभाव अब,
आग लगी हर ऒर देखो गली ग्राम में।
फिर से रमन कोई ऐसी छेड़ देवे तान,
भूलें भेद भाव सब झूमें एक नाम में।
-राम नरेश रमन
नाचते थे वृन्दावन बीच बृज धाम में।
वह मृदु स्वर झंकार करे प्रेम संचार,
भागे भागे आते ऐसी मोहनी थी श्याम में।
हो रहा विलुप्त वह प्रेम सदभाव अब,
आग लगी हर ऒर देखो गली ग्राम में।
फिर से रमन कोई ऐसी छेड़ देवे तान,
भूलें भेद भाव सब झूमें एक नाम में।
-राम नरेश रमन
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