Sunday, June 19, 2016

मुट्ठी भरी धूल ने

-यतीन्द्रनाथ राही

मुट्ठी भरी धूल ने
तुम्हारा आकाश का आकाश
ढक लिया है;
और तुम !
आज भी उसी मुठ्ठी में-
अपने सितारों की चमक,
खोजते हो ?
सवेरे का सूरज
रोज तुम्हारे द्वार पर
दस्तक दे रहा है,
ताज़ा हवा
तुम्हारी झुग्गी झोपणियों के
कंधे सहला रही है।
स्याह रातों में देखे-
भोर के सपने,
पंख खोलकर उड़ जाना चाहते हैं;
किन्तु तुम !
आज भी उस पुरातन केंचुली में लिपटे,
अपनी-अपनी बाँबियों में
पड़े फुन्ना रहे हो।
रोज हवाओं में
लाठियां भांजते हो,
किन्तु किसी हवा का रुख
तुम नहीं मोड़ पाए !
तुम्हारे पुरुषार्थी हाथ
आज भी
याचना में बंधे के बंधे ही हैं।
तुम्हारे दिशाहीन
सुबह और शाम,
बूढ़े हो गए पग डंडियों पर
नाक रगड़ते,
और सोने का भविष्य
आज भी
विद्या मंदिर की सीढियां नहीं चढ़ पाया !
तुमने,
कितने पत्थरों को तराशा
प्राणों की प्रतिष्ठा कर दी,
किन्तु तुम्हारे भीतर का
देवता, तुम्हारा कृष्ण
आज भी चेतना शून्य ही
रहा !
जगाओ उसे
आने दो उसके हाथों में
गति का चक्र
ज्ञान की गीता
संकल्पों का -पाञ्च जन्य !
अंधे धृत राष्ट्रों के नीचे
कब तक दबी रहेगी-
तुम्हारी धरती
तुम्हारी नियति
नीति न्याय और व्यवस्था।
धर्म युद्ध में रथ की बल्गाएं
तुम्हारी मुट्ठियों में
बंधने को प्रतिक्षाकुल हैं।
     
-यतीन्द्र नाथ राही

No comments:

Post a Comment