Sunday, June 12, 2016

साँझ ने विभावरी को

साँझ ने विभावरी को मोती उपहार दिए,
चन्द्रिका के अंग तृण-तृण खिलने लगे।
संदल से वायु ने सुगंध मंद भरी स्वांस,
मार के  बदन में रदन खिलने लगे।
स्वागत में बालक बसंत के दिगन्त तक
प्रात ही कमल दल जल खिलने लगे।
भूमि के हरित परिधान बीच टँकने को
देखो सरसों के पीले फूल खिलने लगे।।

-डा० राजीव राज

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