दशरथ माँझी !
तुम्हें श्रद्धांजलि
तुमने अपने
सुनहरे यौवन के
बाईस वर्ष
पत्थरों का सीना
चीरने में गुजार दिए।
अन्तत: पहाड़ ही हार गया
तुम्हारी जीवटता, साहस और सनक से।
कण कण हो कर बिखर गया
तुम्हारी छैनी की मार से।
तुम
गाँव की पीढ़ियों के लिए
बनाकर प्रगति पंथ
विदा हो गये संसार से
नया इतिहास रचकर।
तुम्हारा श्रम यूं तो अमर है
पर एक ही डर है
कहीं, कोई ?
पौराणिक कथाकार
कालान्तर में
तुम्हारा ये अतुलनीय कार्य
किसी देवी देवता के
नाम न लिख दे
जैसे लिख दिया गंगा को
शिव की जटा के नाम
भागीरथ से छीनकर।
-बलराम सरस
तुम्हें श्रद्धांजलि
तुमने अपने
सुनहरे यौवन के
बाईस वर्ष
पत्थरों का सीना
चीरने में गुजार दिए।
अन्तत: पहाड़ ही हार गया
तुम्हारी जीवटता, साहस और सनक से।
कण कण हो कर बिखर गया
तुम्हारी छैनी की मार से।
तुम
गाँव की पीढ़ियों के लिए
बनाकर प्रगति पंथ
विदा हो गये संसार से
नया इतिहास रचकर।
तुम्हारा श्रम यूं तो अमर है
पर एक ही डर है
कहीं, कोई ?
पौराणिक कथाकार
कालान्तर में
तुम्हारा ये अतुलनीय कार्य
किसी देवी देवता के
नाम न लिख दे
जैसे लिख दिया गंगा को
शिव की जटा के नाम
भागीरथ से छीनकर।
-बलराम सरस
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