बस यूँ ही पूछ लिया मैंने
घनघोर बरसते सावन से
क्या मिलता है तुमको आखिर?
बतलाओ इस पागलपन से
मस्ती में झूमा, सींच गया
फिर से वह धरती का आँगन.
हो गया प्रफुल्लित मेरा मन.
फिर पूछ लिया यूँ ही इक दिन
कुछ फूलों से कुछ कलियों से
दिन-रात बाँटते, क्या मिलता
तुमको? सुगंध की लड़ियों से
फूलों ने हँसकर टाल दिया
कलियों के महक उठे आनन.
हो गया प्रफुल्लित मेरा मन.
फिर पूछा मैंने चंदा के सँग
नील गगन के तारों से
क्या मिलता है तुमको आखिर
अपने इतने किरदारों से?
हौले से थोड़ा हँसा चाँद
फिर तारों ने भर दिया गगन.
हो गया प्रफुल्लित मेरा मन.
फिर एक दिवस पूछा मैंने
नदियों से, प्यारे पेड़ों से
करते रहते उपकार, भला
क्या मिलता तुमको गैरों से ?
अँगड़ाई लेकर हँसा पेड़
नदिया में उभरा अल्हड़पन
हो गया प्रफुल्लित मेरा मन.
मैं रहा सोचता पहरों तक
तब जाकर यही समझ आया
जो दिया जगत को है जितना,
बदले में बस उतना पाया
अपने को मिलना उतना ही
हम कर लें चाहे लाख जतन.
तब हुआ प्रफुल्लित मेरा मन.
हो गया प्रफुल्लित मेरा मन..
-राम सागर यादव
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