नर पिशाच बढ़ते जाते हैं
सोम भाग वे ही पाते हैं
वे स्वच्छन्द गीत गाते हैं
भाग्य बड़ा लख इतराते हैं
छंद सृजन कर पाप नाश हित,
कवि गति हृदय धड़कन है
कवि तू चल उस ओर जिधर,
अतिशय पीड़ा उर तड़फन है
बंधुभाव के सब सुख सपने
देख रहे हैं सब अपने-अपने
लगे स्वार्थ से पैसा जपने
सकल ऐब निज प्रतिपल ढकने
गीतन दूब चाटकर में,
अनाचार-मय कण-कण है
कवि तू चल उस ओर जिधर ...
सीमा पार गई मँहगाई
विकट राक्षसी घर में आई
कर में एक नहीं है पाई
देती युक्ति न एक दिखाई
मुक्तक तेरा दूर करे दुःख,
जग में जो दुःख जन-जन है
कवि तू चल उस ओर जिधर ...
बड़े-बड़ों के घर भरते हैं
दीन कृषक भूखों मरते हैं
सेठ सकल सोना धरते हैं
तस्कर बने अहं करते हैं
तव दोहा चौपाई हर ले,
जन में जो कुछ अन-मन है
कवि तू चल उस ओर जिधर ...
सुख पाते हैं सभी मिनिस्टर
बंगला जिनका लक्ष्मी का घर
फूटा रंक भाग्य अति जर्जर
फूस झोपडी भी है बदतर
गायक हर ले मीत-भीति सब,
सरकारी गठबंधन है
कवि तू चल उस ओर जिधर ...
-शिशुपाल सिंह यादव मुकुंद,
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