Wednesday, December 28, 2022

ग़ज़ल

ऐ दिल सुन नादानी न कर

बहुत हुई मनमानी न कर


ये इश्क तिलिस्म है पेचीदा

अपनी ख़ाक जवानी न कर


वो लोग बड़े हैं ऊँची हस्ती

ख़्वाहिशें आसमानी न कर


तजरुबा पहला ही काफी है

अब किसी को जानी न कर


है वक्त दवा हर मर्ज़ की 

ज़ख्मों से छेड़खानी न कर


रिश्ते नाजुक बंधन साहिल

ज़ियादा खींचातानी न कर


-सुधांशु यादव साहिल


No comments:

Post a Comment