ऐ दिल सुन नादानी न कर
बहुत हुई मनमानी न कर
ये इश्क तिलिस्म है पेचीदा
अपनी ख़ाक जवानी न कर
वो लोग बड़े हैं ऊँची हस्ती
ख़्वाहिशें आसमानी न कर
तजरुबा पहला ही काफी है
अब किसी को जानी न कर
है वक्त दवा हर मर्ज़ की
ज़ख्मों से छेड़खानी न कर
रिश्ते नाजुक बंधन साहिल
ज़ियादा खींचातानी न कर
-सुधांशु यादव साहिल
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