अपने पैरों आदमी, रहा कुल्हाड़ी मार।
अंधा होकर कर रहा, पेड़ों का व्यापार।।
कुछ तो ऊँचे उड़ गए, कुछ बेबस लाचार।
देते कोरी सांत्वना, सत्य नहीं स्वीकार।।
सदुपयोग कर शक्ति का, बनता नर इंसान।
दुरुपयोग करके वही, बन जाता हैवान।।
वैसे तो शुभ काल में, सबको मिलें अनेक।
ताकत बढ़ती चौगुनी, मिले मित्र यदि नेक।।
द्रवित दुखी को देखकर, होते हैं जो लोग।
उनका परिचय शब्द सब, सज्जन करें प्रयोग।।
जनता के दिल को नहीं, जब मिल सके सुकून।
तो फिर है किस काम का, बना हुआ कानून।।
कोरी बातों से कभी, भरा नहीं है पेट।
करो सत्य स्वीकार अब, छोड़ो झूँठ लपेट।।
नियम बने हैं टूटते, भ्रष्ट हुआ है तन्त्र।
तभी अराजक तत्व सब, घूमें यहाँ स्वतन्त्र।।
कठिन जिन्दगी जी रहे, धरतीपुत्र किसान।
उन पर ही गोली चलें, क्या होगा भगवान।।
सीमा पर सैनिक मरें, घर में मरें किसान।
कैसे भारत भूमि पर, सुख पाये इंसान।।
चली गोलियों से गए, कृषक काल के गाल।
धरती माँ की गोद भी, हुई खून से लाल।।
सीमा पर सैनिक सजग, तब हम यहाँ स्वतन्त्र।
बरना घातक दौर से, गुजर रहा जनतन्त्र।।
-रामनरेश रमन
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