अरी व्यवस्था ! है तुझे, लाख लाख धिक्कार।
बच्चों से भी छीनती, जीने का अधिकार।।
बच्चे भी लाचार थे, हम भी हैं लाचार।
लोकतंत्र में लोक पर, भारी भ्रष्टाचार।।
राज भक्ति में लीन हो, भूले जो आचार।
आखिर उनकी गिर गई, कदमों में दस्तार (पगड़ी)।।
ज्यों ज्यों सुविधाएँ बढ़ी, बढ़ता गया तनाव।
तन में रोग असाध्य हैं, मन पर गहरे घाव।।
अरी जिंदगी दे मुझे,थोड़ा सा अवकाश।
अभी गले में हैं डले, क़र्ज़, फ़र्ज़ के पाश।।
किया पूत ने रातभर, "जय माता दी" जाप।
व्याकुल हो माँ दर्द से, करती रही विलाप।।
-रघुविंद्र यादव
बच्चों से भी छीनती, जीने का अधिकार।।
बच्चे भी लाचार थे, हम भी हैं लाचार।
लोकतंत्र में लोक पर, भारी भ्रष्टाचार।।
राज भक्ति में लीन हो, भूले जो आचार।
आखिर उनकी गिर गई, कदमों में दस्तार (पगड़ी)।।
ज्यों ज्यों सुविधाएँ बढ़ी, बढ़ता गया तनाव।
तन में रोग असाध्य हैं, मन पर गहरे घाव।।
अरी जिंदगी दे मुझे,थोड़ा सा अवकाश।
अभी गले में हैं डले, क़र्ज़, फ़र्ज़ के पाश।।
किया पूत ने रातभर, "जय माता दी" जाप।
व्याकुल हो माँ दर्द से, करती रही विलाप।।
-रघुविंद्र यादव
No comments:
Post a Comment