रूप की किताब का
हर पन्ना पुष्प-दंश
और मुझे पढ़ना है बार-बार
यह छुअन कबूतर के पंखों-सी
ज्यों फूलों की कटार पर कोई
जगती है धूप मगर लगता है
अब तक क्यों चाँदनी नहीं सोई
प्यार का कशीदा हूँ
अधरों के रेशम पर
और मुझे कढ़ना है बार-बार
यह कुन्तल-वन, उस पर सूनापन
चन्दन के पात सरसराते हैं
रस के क्षण गंधवती साँसों पर
पारे की आत्मा झुलाते हैं
चित्र हो गया हूँ मैं
काजल की चौखट में
और मुझे मढ़ना है बार-बार
बाँहों पर झूलते-मचलते से
देहयष्टि के सुघड़ सवेरे हों
उस पल मुस्कान सहम जाती है
जिस पल नीलाभ नयन घेरे हो
संयम का हर प्रयास
मंत्र-मुग्ध विषधर-सा
और मुझे लड़ना है बार-बार
-रमेश यादव
हर पन्ना पुष्प-दंश
और मुझे पढ़ना है बार-बार
यह छुअन कबूतर के पंखों-सी
ज्यों फूलों की कटार पर कोई
जगती है धूप मगर लगता है
अब तक क्यों चाँदनी नहीं सोई
प्यार का कशीदा हूँ
अधरों के रेशम पर
और मुझे कढ़ना है बार-बार
यह कुन्तल-वन, उस पर सूनापन
चन्दन के पात सरसराते हैं
रस के क्षण गंधवती साँसों पर
पारे की आत्मा झुलाते हैं
चित्र हो गया हूँ मैं
काजल की चौखट में
और मुझे मढ़ना है बार-बार
बाँहों पर झूलते-मचलते से
देहयष्टि के सुघड़ सवेरे हों
उस पल मुस्कान सहम जाती है
जिस पल नीलाभ नयन घेरे हो
संयम का हर प्रयास
मंत्र-मुग्ध विषधर-सा
और मुझे लड़ना है बार-बार
-रमेश यादव
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