Friday, September 9, 2016

चाँदनी

जब से सँभाला होश मेरी काव्य चेतना ने
            मेरी कल्पना में आती-जाती रही चाँदनी
आधी-आधी रात मेरी आँख से चुरा के नींद
            खेत खलिहान में बुलाती रही चाँदनी
सुख में तो सभी मीत होते किन्तु दुख में भी
            मेरे साथ-साथ गीत गाती रही चाँदनी
जाने किस बात पे मैं चाँदनी को भाता रहा
            और बिना बात मुझे भाती रही चाँदनी

-उदय प्रताप सिंह

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