कितनी पीर बची पीने को
कितने ज़ख्म अभी सीने को
टन भर बाधाएं मिलती हैं
रत्तीभर जीवन जीने को
खुशियों के पल कम होते हैं
सबसे ज्यादा गम होते हैं
जब हो अपना हृदय भारी
दिन उदास हों रातें कारी
खुशियों के मंजर चुभते हैं,
रास न आती दुनिया दारी
कोर नयन के नम होते हैं
सबसे ज्यादा गम होते हैं
दुःख ने समझा पस्त हुए हैं
हम इसके अभ्यस्त हुए हैं
सारे नाटक वो रचता है
हम अभिनय में व्यस्त हुए हैं
कदम-कदम पर भ्रम होते हैं
सबसे ज्यादा गम होते हैं।।
-बलराम सरस
कितने ज़ख्म अभी सीने को
टन भर बाधाएं मिलती हैं
रत्तीभर जीवन जीने को
खुशियों के पल कम होते हैं
सबसे ज्यादा गम होते हैं
जब हो अपना हृदय भारी
दिन उदास हों रातें कारी
खुशियों के मंजर चुभते हैं,
रास न आती दुनिया दारी
कोर नयन के नम होते हैं
सबसे ज्यादा गम होते हैं
दुःख ने समझा पस्त हुए हैं
हम इसके अभ्यस्त हुए हैं
सारे नाटक वो रचता है
हम अभिनय में व्यस्त हुए हैं
कदम-कदम पर भ्रम होते हैं
सबसे ज्यादा गम होते हैं।।
-बलराम सरस
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