Wednesday, September 7, 2016

उगे हैं शहर में अब

उगे हैं शहर में अब धूप के जंगल
रचे हैं आदमी ने ईंट से जंगल

जमी है गाड़ियों की भीड़ सड़कों पर
मुझे लगते हैं अब तो रास्ते जंगल

मैं अपने गाँव जाकर इसलिए रोया
नहीं अब गांव में भी छाँव के जंगल

हिला के हाथ बादल उड़ गया देखो
नदी सूखी, हुए सब अनमने जंगल

हमीं से ज़िन्दगी की राहतें सब हैं
यही कहते हैं हमसे आपसे जंगल

सफ़र में ज़िन्दगी के, छाँव करते हैं
तुम्हारी याद के ये सर चढ़े जंगल

जहां देखो यही एक बोध है 'आलोक'
उगे हैं आदमी की भूख के जंगल

-आलोक यादव

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