Saturday, August 20, 2016

जब से हमने

जब से हमने स्‍वयं की पहचान को खोया
तब से हमने अधिक गहरे दर्द को बोया

यों बहुत होती रहीं बदलाव की बातें
आ गया ठहराव तो हर आदमी रोया

दूर तक फैली रही भटकाव की छाया
जब चले हँसने तो आँसू ने पलक धोया

दूसरों के गम हमीं कब तक भला रोते
शुष्‍क आँसू रह गया है एक अनबोया

आह भरते हैं मगर आहट नहीं होती
मन से मन की दूरियों में आदमी खोया


-मदन मोहन उपेन्द्र

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