Sunday, July 17, 2016

ज़िंदगी बदले रोज़ पड़ाव

कितनी बार हृदय टूटा है
कितनी बार क्रोध फूटा है
कितनी बार मधुरिमा जागी
कितनी बार हुआ मन बागी
ढूँढ़ ढूँढ़ थक गये
कहीँ भी मिला नहीँ ठहराव
ज़िंदगी बदले रोज़ पड़ाव

आखिर किसे बनायें अपना
कैसे मन बहलायें अपना
कहके होती बात बिरानी
किसको दर्द सुनायें अपना
कल उससे दुश्मनी ठनेगी
जिससे आज लगाव

चलते रहे लोग जीवन भर
पहुँचे नहीं मगर मंजिल पर
कितनी बार लौट आया हूँ
मैं अपनी मंज़िल छू छू कर
मंज़िल पाकर भी न मिट सका
इस मन का भटकाव

कुछ भी यहाँ नहीँ निश्चित है
आज मिला तो कल वंचित है
सुख सागर में दुख की लहरें
तैर न जायें मन चिंतित है
कब घुस जाय नाव में पानी
कब पानी में नाव

-डा० अजय अटल 

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