कितनी बार हृदय टूटा है
कितनी बार क्रोध फूटा है
कितनी बार मधुरिमा जागी
कितनी बार हुआ मन बागी
ढूँढ़ ढूँढ़ थक गये
कहीँ भी मिला नहीँ ठहराव
ज़िंदगी बदले रोज़ पड़ाव
आखिर किसे बनायें अपना
कैसे मन बहलायें अपना
कहके होती बात बिरानी
किसको दर्द सुनायें अपना
कल उससे दुश्मनी ठनेगी
जिससे आज लगाव
चलते रहे लोग जीवन भर
पहुँचे नहीं मगर मंजिल पर
कितनी बार लौट आया हूँ
मैं अपनी मंज़िल छू छू कर
मंज़िल पाकर भी न मिट सका
इस मन का भटकाव
कुछ भी यहाँ नहीँ निश्चित है
आज मिला तो कल वंचित है
सुख सागर में दुख की लहरें
तैर न जायें मन चिंतित है
कब घुस जाय नाव में पानी
कब पानी में नाव
-डा० अजय अटल
कितनी बार क्रोध फूटा है
कितनी बार मधुरिमा जागी
कितनी बार हुआ मन बागी
ढूँढ़ ढूँढ़ थक गये
कहीँ भी मिला नहीँ ठहराव
ज़िंदगी बदले रोज़ पड़ाव
आखिर किसे बनायें अपना
कैसे मन बहलायें अपना
कहके होती बात बिरानी
किसको दर्द सुनायें अपना
कल उससे दुश्मनी ठनेगी
जिससे आज लगाव
चलते रहे लोग जीवन भर
पहुँचे नहीं मगर मंजिल पर
कितनी बार लौट आया हूँ
मैं अपनी मंज़िल छू छू कर
मंज़िल पाकर भी न मिट सका
इस मन का भटकाव
कुछ भी यहाँ नहीँ निश्चित है
आज मिला तो कल वंचित है
सुख सागर में दुख की लहरें
तैर न जायें मन चिंतित है
कब घुस जाय नाव में पानी
कब पानी में नाव
-डा० अजय अटल
No comments:
Post a Comment