Wednesday, June 22, 2016

प्रजातंत्र का अजब तमाशा

-रामनरेश रमन

मेढक फँसा
साँप के मुख में
कैसे जान बचे

करुणा भरी
पुकारें सुनकर
जुरे लोग बहुतेरे
देख तमाशा
मौन खड़े सब
हों ज्यों सभी सपेरे
कोई रक्षक
भरी भीड़ में
उसको नहीं जँचे

प्रजातंत्र का
अजब तमाशा
राजा राज करे
गरदन फँसे
वही चिल्लाये
दूजे देख डरे
पाचन शक्ति
गजब है उसकी
सब कुछ तुरत पचे

अपनी ताकत
कब पहिचानें
लोकतंत्र के स्वामी
देखादेखी
औरों की बस
भरते रहते हामी
रह जायेंगे
धरे यहीं सब
जो परपंच रचे

-राम नरेश रमन

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