-जयराम जय
मंच पर
छाने लगे हैं चुटुकुले
कौन तोड़ेगा ये पथरीले किले ?
हो गयीं
दुर्योधनी हैं कामनाएँ
अनवरत धृतराष्ट्र
जैसी भावनाएँ
जिनको अपना
साथ देना चाहिये था
वह चले हैं गैर का
परचम उठाये
सूर्य के वंशज भी
तम से जा मिले
कौन तोड़ेगा ये पथरीले किले ?
रख दिया गाण्डीव
अर्जुन ने किनारे
यह मेरा परिवार
इसको कौन मारे
द्रोण के संग
भीष्म भी बैठे सभा में
सर झुकाये-
और हठ कर मौन धारे
चल रहे फूहड़
यहाँ जो सिलसिले
कौन तोड़ेगा ये पथरीले किले ?
शारदा-सुत
आज अर्थार्थी हुये
छन्द पिंगल
तोड़ कर भरती हुये
तालियों के
मोंह में निज कर्म तज
जोकरों के
वे भी अनुवर्ती हुये
कव्य के श्रोता
को यह शिकवे गिले
कौन तोड़ेगा ये पथरीले किले ?
मंच पर
छाने लगे हैं चुटकुले
कौन तोड़ेगा ये पथरीले ?
-जयराम जय
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