पता नहिन कस स्वाद मिलत है छोटू का
खाना सबके बाद मिलत है छोटू का
बिगरि जाय जो तिनको काम करत बेरिया
दुइ थप्पड़ परसाद मिलत है छोटू का
करै नौकरी चाहे जेतना नीके घर
यक ना यक जल्लाद मिलत है छोटू का
छोटू की किसमति मा लिखी गुलामी है
वतन कहाँ आजाद मिलत है छोटू का
होटल, ढाबा, महल, झोपड़ी सबै जगह
पीड़ा जिन्दाबाद मिलत है छोटू का
होत भोरहरे पाँव छुवत है मालिक के
बेमन आसिरबाद मिलत है छोटू का
"अग्यानी" बेतन तो सिरिफ कलपना है
कबौ-कबौ इमदाद मिलत है छोटू का ।।
-डा० अशोक अज्ञानी
["चिरइया कहाँ रहैं" अवधी गज़ल संग्रह से]
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