Sunday, June 19, 2016

गजल


पता नहिन कस स्वाद मिलत है छोटू का
खाना सबके बाद मिलत है छोटू का

बिगरि जाय जो तिनको काम करत बेरिया
दुइ थप्पड़ परसाद मिलत है छोटू का

करै नौकरी चाहे जेतना नीके घर
यक ना यक जल्लाद मिलत है छोटू का

छोटू की किसमति मा लिखी गुलामी है
वतन कहाँ आजाद मिलत है छोटू का

होटल, ढाबा, महल, झोपड़ी सबै जगह
पीड़ा जिन्दाबाद मिलत है छोटू का

होत भोरहरे पाँव छुवत है मालिक के
बेमन आसिरबाद मिलत है छोटू का

 "अग्यानी" बेतन तो सिरिफ कलपना है
कबौ-कबौ इमदाद मिलत है छोटू का ।।  

-डा० अशोक अज्ञानी
["चिरइया कहाँ रहैं" अवधी गज़ल संग्रह से]

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