-राजपाल यदुराज
जब से शपथ भुलाने की ली,
दूनी याद तुम्हारी आयी,
ऐसा लगता है यह जीवन
मेरा नहीं तुम्हारी थाती।
कितने जनम-जनम का जाने,
मेरा और तुम्हारा नाता
कोई पाप हुआ अनजाने
मिलने देता नहीं विधाता
प्रायश्चित के समय बताओ
तुम भी दूर-दूर रहते हो,
एकाकी साधना अधूरी
जलता नहीं दिया बिन बाती।
मेरी भूल रही बस इतनी
स्वीकारा जो मौन निमंत्रण
ऐसा बंदी बना दिया हूँ
हर उड़ान पर लगा नियंत्रण
पहले-पहले घाव अभी तक
शपथ तुम्हारी भरे नहीं हैं,
प्रायः पीर उभर आती है,
जब-जब याद तुम्हारी आती।
अनुमोदन मिल गया तुम्हारा,
मेरे लिए यही क्या कम था
प्यार और पीड़ा दो चीजें,
सच कहता हूँ कोरा भ्रम था
दोष तुम्हें दूं या दुनिया को
या अपना दुर्भाग्य समझ लूँ-
जितनी दूरी तय करता हूँ,
उतनी डगर और बढ़ जाती
एसा लगता है यह जीवन
मेरा नहीं तुम्हारी थाती।।
-राजपाल यदुराज
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