हाइकु कविताएँ
उछल रहे
बादलों की गोद में
बाल खरहे
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उभरे मेघ
ऊँटों के कूबड़ से
अलस्सुबह
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कुहरे में भी
जिस्म को फोड़कर
निकला चाँद
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केश फैलाये
नदी की रेत पर
उतरी साँझ
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गपोड़ा मेघ
बना रहा नभ में
अनुकृतियाँ
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गुनगुनाता
रदीफ काफिये में
नदी का जल
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चिड़िया उड़ी
रह गई रिक्तता
ठूँठ पेड़ की
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चूसती ईख
जाड़े की सुबह में
साँझ की बेटी
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छापे बैठी है
पखनों से अण्डों को
वन पेढ़की
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झींगा मछली
जा छिपी शैवाल में
ढूँढ़ता नभ
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ढोर ढुरके
खुरों से धूल उड़ी
अम्बर तक
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तोड़ते दम
खूँटियों पर टँगे
बाबा के वस्त्र
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नन्हें फूलों ने
लिखीं लघुकथाएँ
ओस बूँदों से
-रामनिवास पंथी
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