Monday, May 23, 2016

रामनिवास पंथी


 हाइकु कविताएँ 


उछल रहे
बादलों की गोद में
बाल खरहे
000

उभरे मेघ
ऊँटों के कूबड़ से
अलस्सुबह
000

कुहरे में भी
जिस्म को फोड़कर
निकला चाँद
000

केश फैलाये
नदी की रेत पर
उतरी साँझ
000

गपोड़ा मेघ
बना रहा नभ में
अनुकृतियाँ
000

गुनगुनाता
रदीफ काफिये में
नदी का जल
000

चिड़िया उड़ी
रह गई रिक्तता
ठूँठ पेड़ की
000

चूसती ईख
जाड़े की सुबह में
साँझ की बेटी
000

छापे बैठी है
पखनों से अण्डों को
वन पेढ़की
000

झींगा मछली
जा छिपी शैवाल में
ढूँढ़ता नभ
000

ढोर ढुरके
खुरों से धूल उड़ी
अम्बर तक
000

तोड़ते दम
खूँटियों पर टँगे
बाबा के वस्त्र
000

नन्हें फूलों ने
लिखीं लघुकथाएँ
ओस बूँदों से
-रामनिवास पंथी

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