भीड़ में भटका बहुत हैरान सा
काश कोई तो मिले इंसान सा
कर गयी मासूम की सिसकी बयाँ
है दरिंदा जो दिखे भगवान सा
तेरी शर्तों ने इसे उलझा दिया
खेल दिल का था बहुत आसान सा
एक चिंगारी गिरी अफवाह की
जल उठा सारा शहर शमशान सा
आँधियाँ जब से सियासत की चलीं
है मुहब्बत का शज़र वीरान सा
रो रहा जो ज़ख्म खाकर पीठ पर
दिख रहा बेहाल हिन्दुस्तान सा
पान भी देते हो आँखें फेर कर
ये तेरा सम्मान भी अपमान सा
जिंदगी का बोझ फूलों की तरह
और तेरा प्यार है गुलदान सा
-डा० राजीव राज
No comments:
Post a Comment