Saturday, May 21, 2016

भीड़ में भटका बहुत

भीड़  में  भटका  बहुत  हैरान  सा
काश  कोई  तो  मिले  इंसान  सा

कर  गयी मासूम  की सिसकी बयाँ
है  दरिंदा  जो   दिखे  भगवान  सा

तेरी  शर्तों  ने  इसे उलझा  दिया
खेल दिल का था बहुत आसान सा

एक  चिंगारी   गिरी  अफवाह की
जल उठा सारा शहर शमशान सा

आँधियाँ जब से सियासत की चलीं
है मुहब्बत  का  शज़र  वीरान सा

रो रहा जो  ज़ख्म  खाकर पीठ पर
दिख  रहा  बेहाल  हिन्दुस्तान सा

पान  भी  देते  हो  आँखें  फेर  कर
ये  तेरा  सम्मान  भी  अपमान सा

जिंदगी  का  बोझ  फूलों  की तरह
और  तेरा  प्यार  है  गुलदान सा

-डा० राजीव राज

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